Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verses 7–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
देशकालक्रियाद्येतदेकता वासनैकता ।
तयोर्यदेव बलवत्तदेव जयति क्षणात् ॥ ७ ॥
एवं विभागेनैतेऽत्र चत्वारः समवस्थिताः ।
कृष्यन्ते द्वावविद्यार्थमन्यो मुक्तो मृगोऽपरः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, अब आप प्रस्तुत
विषय को सुनिये । ब्रह्माण्ड के दो खप्पर जिनका कि विस्तार पूर्वोक्त एक अरब योजन है, उनसे बाहर
दसगुना जल (जलावरण) स्थित है । वे ब्रह्माण्ड के खप्पर ही पार्थिवभाग होने से अपनी आकर्षणशक्ति
से जल को ऐसे ही नित्य धारण करते हैं जैसे कि तृणचुम्बकमणि अपनी आकर्षणशक्ति के स्वभाव से
तृणों को धारण करती है अथवा जैसे कल्पवृक्ष अर्थियों से वांछित रत्नों को धारण करता हे