Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
स एकः शुभसंगत्या विदुषां मध्यमागतः ।
दृश्यं यथावद्विज्ञाय ब्रह्मतामलमागतः ॥ १३ ॥
तत्रैवाशु परिज्ञानात्साऽविद्या स च देहकः ।
मृगतृष्णाम्ब्विवाशान्तिमागतौ रागतन्त्रितौ ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
आदि, मध्य
और अन्त से (जन्म, स्थिति और विनाश से) शून्य महाचित् नामवाले, सर्वत्मिक लोहघन के समान
छिद्रशून्य निर्वाणरूपी उस ब्रह्ममहाकाश में दूर-दूर वैसे करोड़ों ब्रह्माण्ड बार-बार उत्पन्न होते हैं
ओर विलीन होते हैं