Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
इति ते सर्वमाख्यातं विपश्चिच्चेष्टितं स्फुटम् ।
अनन्तैवमविद्येयं ब्रह्मवत्तन्मयी यतः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह कौन कारण है, जो करोड़ों ब्रह्माण्ड को विकसित करता है ? इस प्रश्न पर कहते है ।
कचनरूपी सम ब्रह्म में करोड़ों ब्रह्माण्डं को विकसित करनेवाला कोई भी नहीं है, किन्तु
कचनस्वभाव वह ब्रह्म ही अपने में अविद्यावश तादुशरूप से स्थित हे