Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माण्डमण्डपस्यास्य भ्रमतेत्यविपश्चिता ।
लब्धो युगशतैरन्तो नाविद्याया विपश्चिता ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जहाँपर उसकी मृत्यु हुई थी,
वह प्रदेश पुण्यमय था यानी स्थूल देह के विषय संस्कार के उद्बोधक चार प्रकार के प्राणिसमूहों से
शून्य था, उस देश की महिमा से निर्मल आशयवाले विपश्चित् को आतिवाहिक शरीर में आधिभोतिकता
की प्रतीति नहीं हुई अर्थात् उसे आतिवाहिकता का विस्मरण नहीं हुआ