Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
स ब्रह्माण्डकपाटः किं न संप्राप्तो विपश्चिता ।
त्वयैतत्कथितं ब्रह्मन्न कथं वदतां वर ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त विपश्चित् जिसका
ज्ञान स्थूलदेह से अतिरिक्त केवल आत्मा को विषय करता था, उससे अधिक स्थूल, सूक्ष्म और कारण
शरीर से अतिरिक्त शुद्ध चिन्मात्र आत्मा को विषय करनेवाले बोध को प्राप्त नहीं हुआ था, इससे
दिगन्तदर्शनरूप कार्य को असमाप्त समझकर गमन स्वभाव के अनुकूल हुआ यानी दिगन्तदर्शनरूप
कार्य से विरत नहीं हुआ