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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । जातेनैव विरिञ्चेन पुरा ब्रह्माण्डमण्डलम् । द्वाभ्यामधस्तादूर्ध्वात्स्वभुजाभ्यां प्रविदारितम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

देहविहीन चित्त बाहर कैसे जाता है ? देह के बिना चित्त का बाहर संचार स्वीकार करने पर भी पहले विपश्वित्‌ की देवता के शरीर से भी आकाशमार्ग मे अप्रतिहत गति रही । देवशरीर का नाश होने पर भी मनोमय देह से आकाशमार्ग में चल रहे उस विपश्चित्‌ का पूर्व देवशरीर से मनोमात्र देह मे क्या विशेष हुआ ऐसा श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिश्वर, यह चित्त शरीर के बिना कार्य में कैसे गमन करता है ? यदि शरीर के बिना भी गमन मान लिया जाय तो भी आतिवाहिक देह से मनोमय देह में अधिक बोध कैसा होता है ?