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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

भागस्तेनोर्ध्वतस्तस्मादतिदूरतरं गतः । अतो भागो गतोऽधस्तादतिदूरतरान्तरम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवस्तिष्ठजी उक्त प्रश्नों में से पहले प्रथम प्रश्न का उत्तर देते हैं। जैसे अन्तःपुर में निवास करनेवाले का यह मन संकल्परूपी पथिक के रूपमें बाहर गमन करता है वैसे ही इसका मन बाहर प्रसृत हुआ | भाव यह कि संकल्प को मार्गगमन में देह की अपेक्षा नहीं होती है