Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
तेन मार्गेण यातोऽसौ विपश्चिदृक्षचक्रवत् ।
अविद्यायाः परीक्षार्थमामोक्षमतिदीक्षितः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
आतिवाहिक शरीर की निवृत्ति से चिन्मात्र का शेष होने में भी विचार ही साधन है, इस आशय से
कहते हैं।
हे श्रीरामजी, इस आतिवाहिक देह का "तेजसा सोम्य शुंगेन सन््मूलमन्विच्छ' (हे सौम्य, तेजरूपी
मूल से सन्मूल की खोज करो) इस श्रुति द्वारा प्रदर्शित तत्त्वज्ञान के उपाय से भली-भाँति तब तक
विचार कीजिये जब तक कि इसमें चिन्मात्र से अतिरिक्त कुछ नहीं है यह प्रतीति न हो