Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैवानन्तरूपेयमविद्या तन्मयी यतः ।
अतोऽस्ति साऽपरिज्ञाता परिज्ञाता न विद्यते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्विषय चिन्मात्र प्रसिद्धि का तो पहले अनेक बार वारण किया ही जा चुका है, इस आशय से पहले
अनेक बार उक्त आधे श्लोक को पुनः कहते हैं।
एक देश से दूसरे देश की प्राप्ति होने में मध्यमे जो संवित् का शरीर है एकरूप असीम इस चिन्मात्र
का वह रूप प्रसिद्ध ही है