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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verses 28–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verses 28–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

विपश्चित इति प्राप्य दूराद्दूरं परेऽम्बरे । जगद्रूपेष्वविद्याया भ्रमन्त्यन्येषु केषुचित् ॥ २८ ॥ कश्चिन्मुक्तो मृगः कश्चित्कौचिदद्यापि तौ क्वचित् । भ्रमतः प्राक्तनानल्पसंस्कारविवशीकृतौ ॥ २९ ॥ श्रीराम उवाच । कीदृशेषु क्व दूरेषु ते जगत्सु विपश्चितः । भ्रमन्तीति मुने ब्रूहि मयि चेज्जायते कृपा ॥ ३० ॥ कियत्यध्वनि संसारास्ते जाता येषु ते मुने । महदेतदिहाश्चर्यमस्माकं कथितं त्वया ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें द्वैतरूपी विषय और विषयप्रयुक्त राग, द्वेष आदि का प्रसंग ही नहीं है, ऐसा कहते हैं। भला बतलाइये तो सही उसमें कहाँ दवेत है, कहाँ द्वेष है ओर कहाँ राग आदि है सब कुछ शिव आदि अन्तविहीन परम बोधरूप ही है