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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । स्थितौ विपश्चितौ राम तावुभौ जगतोर्ययोः । तेऽस्माकं गोचरं याते जगती यत्नतोऽपि नो ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

मनके मनन से शून्य शान्त जो अवस्थिति है वही उत्तम बोध है, आतिवाहिक देह में स्थित विपश्चित्‌ उस बोध को प्राप्त नहीं हुआ, किन्तु उसे केवल आतिवाहिक देह में आत्मप्रतीति हुई थी अतएव उसने अपने मन को आगे चलते हुए देखा । आतिवाहिक देह से उसने गर्भवास के तुल्य अन्धकार देखा । तम के अन्त में उसने ब्रह्माण्ड खप्पररूप भूमि के खण्ड को (दो खप्परों के सम्पुट भागों के सन्धिभूत भूखण्ड को) पाया जो वज्र के समान दृढ, सुवर्णमय और करोड़ों योजन विस्तीर्ण था । ।२९-३१॥ उसके अन्त में उसे उस भूखण्ड से आठगुना जल मिला वह द्वीप के अन्त में ब्रह्माण्डखप्पर भूमि के ही समानान्तर में सागर के पृष्ठ के समान स्थित था । जल का निराधार रहना सम्भव नहीं है, अतः वह ब्रह्माण्डकपालखण्ड का अवलम्बन कर उसी के समान विभक्त होकर स्थित था, यह भाव है