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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verses 34–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । विपश्चिन्मृगतां यातो यस्मिञ्जगति संस्थितः । तज्जगत्क्व महाबुद्धे यथावत्कथयेति मे ॥ ३४ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । दूराद्दूरतरं गत्वा परब्रह्ममहाम्बरे । मृगो विपश्चिज्जगति स यस्मिंस्तज्जगच्छणु ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

तैजस आवरण में भ्रमण कर रहे उस विपश्चित्‌ ने दाह, शोक आदि से मुक्त मनोमय देह से उसके उत्तरवर्ती वायुरूप आवरण में गमन जाना