Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
तदिदं विद्धि त्रिजगदिहासौ संस्थितो मृगः ।
इदं तत्परमाकाशं दूरदूरे जगत्स्थितम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
उसका उक्त गमन प्रायः स्वप्न की कल्पना के तुल्य रहा वास्तविक नहीं रहा यह बुबुधे” पदका
तात्पर्य बतलाते हैं।
पहुँचाये जा रहे उस विपश्चित् ने आतिवाहिक आत्मा को जाना और चित् मात्ररूप मेरा कौन-सा
वहन होगा यह भी जाना ॥ ३ ५॥ इस बोध से उक्त धीरात्माने उस वायुसागर को पार किया ओर उसके
बाद वह उससे दस गुने विस्तृत आकाश में पहुँचा