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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verses 37–44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verses 37–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 37-44

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । विपश्चिदस्मादेवासौ जगतस्तां गतिं गतः । इहैवाद्य मृगो जातः कथमेतत्समञ्जसम् ॥ ३७ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । अवयवानवयवी नित्यं वेत्ति यथाखिलान् । तथा सर्वानहं वेद्मि ब्रह्मण्यात्मन्यवस्थितान् ॥ ३८ ॥ अनिष्ठितान्ससंहारान्नानाकारांस्तु तान्बहून् । मिथः प्रोतान्मिथोदृश्यान्स्वरूपानिव पार्थिवान् ॥ ३९ ॥ तत्र कस्मिंश्चिदन्यस्मिन्मार्गेऽस्मिन्निव तिष्ठति । यद्वृत्तं कथितं राम तदेतद्भवते मया ॥ ४० ॥ विपश्चितोऽन्यसंसारे देहैर्भ्रान्ता दिगन्तरान् । ताननन्ताम्बरे व्योम्नि तावत्कालमखिन्नधीः ॥ ४१ ॥ इहैव हरिणा जातः कस्मिंश्चिद्गिरिकन्दरे । काकतालीययोगेन भ्रान्त्वा भूरिजगद्भ्रमम् ॥ ४२ ॥ स जगन्ति भ्रमन्दूरे यस्मिन्सर्गे मृगः स्थितः । ससर्गोऽयमिति व्योम्नि काकतालीयवत्स्थितम् ॥ ४३ ॥ श्रीराम उवाच । एवं चेत्तद्वद ब्रह्मन्कस्यां ककुभि मण्डले । कस्मिन्कस्मिंश्च शैलेऽसौ वने कस्मिन्मृगः स्थितः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश को लाँघकर वह असीम अविद्याशबल ब्रह्माकाश में पहुँचा । जिसमें सब कुछ विलीन होता है, सब कुछ जिससे आविर्भूत होता है जो कुछ भी नहीं है। वहाँ पर मनोमय देह से भ्रमण करता हुआ वह संस्कारवश अत्यन्त दूर तक गया। उसने उसमें पृथिवी, जल, तेज, वायु और जगत्‌ देखा । फिर संसार की रचनाएँ देखीं, फिर सृष्टियाँ देखीं ओर दिशाएँ देखीं। फिर पर्वत देखे, फिर आकाश देखा , फिर देवता देखे, फिर मनुष्य देखे, फिर पंचमहाभूतों के पर्यन्त में अत्यन्त घन ब्रह्म देखा, फिर उसमें खूब जगत्‌ देखे, फिर सृष्टियाँ देखीं, फिर दिशाएँ देखीं, मायाशबल ब्रह्माकाश देखा। उसके बाद फिर दूसरी अवस्थित सृष्टियाँ देखीं। इस प्रकार दीर्घकाल तक विहार करता हुआ वह आज भी विहार कर रहा है। चिरकाल से अभ्यस्त अपने जगत्सत्यतानिश्चय से वह विरत नहीं होता है। अविद्या का अन्त है ही नहीं, सत्य स्वभाव की आलोचना की जाय, तो वह ब्रह्म ही है। वस्तुतः परिपूर्ण ब्रह्म मे अविद्या नहीं है। यह दृश्य है यह अविद्या हे यह विकसित आत्मा हे । जो ब्रह्म आपने जाग्रत में और स्वप्न में जैसी वासना के आविर्भाव से पहले देखा, इस समय देखते हैँ और आगे भी देखेंगे वह ब्रह्म वैसा ही था, हे ओर रहेगा