Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स पश्यत्स्वेव सभ्येषु मृगोऽथ नरतामगात् ।
ज्वालोदरे नभस्यभ्रलवो रूपान्तरं यथा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रस्तुत कथा का उपसंहार करते हैं।
इस प्रकार विपश्चितो का चरित्र आदि से अन्त तक सारा का सारा स्पष्ट रीति से मेने आपसे कहा ।
इस प्रकार यह अविद्या कारणवब्रह्म के तुल्य-सकल दिशाओं में विपश्चितो को इसका अन्त न मिलने के
कारण-अनन्त हे, कारण कि यह कारणब्रह्ममयी हे