Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verses 11–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verses 11–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 11-14

संस्कृत श्लोक

एतस्मिन्नन्तरे ध्याने विचार्य मुनिपुङ्गवः । मृगं विलोकितैः क्षीणपापं कुर्वन्नुवाच ह ॥ ११ ॥ संस्मृत्य प्राक्तनीं भक्तिं भगवन्हव्यवाहन । कुरु कारुण्यतः कान्तं मृगमेनं विपश्चितम् ॥ १२ ॥ वदत्येवं मुनौ दूराद्धावित्वा नृपसंसदि । मृगोऽग्निं वेगनिर्मुक्तः शरो लक्ष्यमिवाविशत् ॥ १३ ॥ ज्वालाजालं प्रविष्टोऽसावादर्श इव बिम्बितः । संध्याभ्र इव विश्रान्तो दृष्टः स्पष्टशरीरकः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस समय पश्चिम विपश्वित्‌ की जिस वृत्तान्त से मुक्ति हुई, उसको पुनः सुनाते है । हे श्रीरामजी, अब विपश्चित्‌ का अपनी वासना से कल्पित ब्रह्माण्ड में हुए वृत्तान्त का श्रवण कीजिये, ब्रह्माण्ड में अत्यन्त दूरवर्ती स्वादूदक सागर के परले पार स्थित स्वर्णभूमि प्रदेश में, किसी संसारभ्रान्ति में, ब्रह्मरूपी महाकाश में अध्यस्त किसी दुश्यमण्डल में, जो दुश्यरूप से प्राप्त हुआ था, वास्तव में ब्रह्मरूप ही था, वह पश्चिम दिशा को प्रस्थित एक विपश्चित्‌ शान्ति, दान्ति भगवद्भक्ति आदि गुणों की प्राप्ति से जीवन्मुक्तो के बीच में जा पहुँचा, वहाँपर दृश्य को यथार्थ रूपसे पहचानकर पूर्णरूप से ब्रह्मत्व को प्राप्त हो गया (मुक्ति को प्राप्त हो गया) | उसकी वह जगदाकार अविद्या ओर वह क्षुद्र शरीर दोनों ही ज्ञान होने से वहीं पर मृगतृष्णाजल के समान शीघ्र ही बाधित हो गये, कारण कि वे दोनों रागमूलक थे, ज्ञानवश राग के नष्ट होनेपर वे विलीन हो गये । भगवती श्रुति ने कहा है जव इसके हृदय में स्थित सभी काम मुक्त हो जाते हैं, छूट जाते हैं, उसके बाद मनुष्य अमर हो जाता है, यहीं पर मुक्तिरूप सुखका अनुभव करता है