Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अर्कबिम्ब इवादित्यश्चन्द्रबिम्ब इवोडुपः ।
महाम्भसीव वरुणः संध्याभ्र इव वा शशी ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तन्मयी" इस कथन का भी तात्पर्य कहते है।
वह ब्रह्म ही अपरिज्ञात होकर शीघ्र मिथ्या, अविद्या आदि शब्दों से कहा जाता है, परिज्ञात होकर
शान्त और ब्रह्म कहा जाता है