Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अक्षमालाधरः शान्तो हेमयज्ञोपवीतवान् ।
अग्निशौचाम्बरच्छन्नः सद्यश्चन्द्र इवोदितः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ब्रह्माण्ड के दो खप्परों के विभाग मे पाषाणोपाख्यानोक्त कारण की याद दिलाते हैं।
पुराने जमाने में उत्पन्न होते ही श्रीब्रह्माजी ने अपनी दोनों भुजाओं से ऊपर और नीचे की ओर
ब्रह्माण्डमण्डल को विदीर्ण किया