Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
सभालोके गतस्पन्दे स्मयेनात्मनि तिष्ठति ।
भासो मुहूर्तमात्रेण दृष्ट्वा स्वोदन्तमक्षतम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त आकाश में जल आदि आवरणों का स्पर्श नहीं होता है और वे उसमें हैं भी
नहीं वह निर्मल जीवशून्य प्रलयपर्यन्त अन्य भूतों का आधार है