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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verses 27–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verses 27–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 27-29

संस्कृत श्लोक

स चागत्य वसिष्ठाय प्रणाममकरोन्मुदा । ज्ञानार्कप्राणद ब्रह्मन्नमस्तेऽस्त्वित्युदाहरत् ॥ २७ ॥ तमुवाच वसिष्ठोऽपि हस्तेन शिरसि स्पृशन् । अद्य ते सुचिराद्राजन्नविद्यायाः क्षयोऽस्त्विति ॥ २८ ॥ रामं जयेति जल्पन्तं नतं दशरथोऽथ तम् । आसनात्किंचिदुत्तिष्ठन्समुवाच हसन्निव ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

तब तो दृढ़तर पुरुषप्रयत्न के अट्टूट रहने से अविद्या का अन्त उसने क्यों नहीं देखा ? ऐसी यदि किसी को आशंका हो तो अविद्या के अवास्तविक अनन्त ब्रह्मरूप होने से ही नहीं देखा, ऐसा कहते हैं । अनन्तरूपा यह अविद्या ब्रह्म ही है। क्योकि ब्रह्ममयी है। जब तक उसके तत्त्व का परिज्ञान नहीं होता तभी तक उसकी सत्ता है। तत्त्वज्ञान होने पर उसका अस्तित्व नहीं रहता हे । इस प्रकार वे विपश्चत्‌ ब्रह्माकाश में अत्यन्त दूर पहुँचकर अविद्या के जगत्रूप कतिपय अन्यान्य स्वरूपा में भ्रमण करते हे । एक तो उनमें मुक्ति पा गया, एक मृग बना है, कोई दो प्राक्तन दृढ़ प्रबल संस्कार से विवश होकर आज भी कहींपर भ्रमण करते हैँ