Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
कियन्त्याश्चर्यमेतानि जगन्ति विततात्मनि ।
संततानि चिरं तानि विभ्रान्तानि विपश्चिता ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा :
हे महामते, मृगता को प्राप्त हुआ विपश्चित् जिस जगत् में स्थित है, वह जगत् कहाँ है ? यथार्थरूप से
मुझ से उसका वर्णन करने की कृपा कीजिये