Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
व्योमात्मनोऽपि महिमायमहो नु कीदृगस्य स्वभावविभवस्य चिदात्मवृत्तेः ।
यः शून्य एव परमात्मघनेऽम्बरेऽन्तरेवंविधानि विविधानि जगन्ति भान्ति ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : परब्रह्माकाश में अत्यन्त दूर
जाकर मृग बना विपश्चित् जिस जगत् में रहता है, उस जगत् को आप सुनिये