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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verses 39–43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verses 39–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 39-43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अन्य लोक की दृष्टि में जो अत्यन्त अतीत है वह भी ब्रह्मद्ृष्टि से अत्यन्त समीपवर्ती ही है कालतः भी किसी की दूरता नहीं है, इस आशय सरे वलिष्ठजी ब्रह्माण्डो को विशेषण विशिष्ट कहते हैँ । आगे चिरकाल में उत्पन्न होनेवाले होने से इस समय अनुत्पन्न, पूर्व काल में प्राप्त हुए संहार से युक्त विविध आकारवाले (अत्यन्त विलक्षण) परस्पर एक दूसरे से अदृश्य होते हुए भी एक चित्‌ में अध्यस्त होने के कारण परस्पर अनुस्यूत अतएव पृथ्वी विकाररूप वस्त्र, तन्तु आदि के समान स्थित बहुत से ब्रह्माण्डों को मैं देखता हू । उन ब्रह्माण्डं से किसी के अन्य मार्ग में इस ब्रह्माण्ड के मार्ग के समान स्थित होने पर जो घटना हुई उसको मैंने आपके लिए इस ब्रह्माण्ड की-सी बनाकर यहींपर विपश्चित्‌ के जन्म, राज्य आदि थे, यों वर्णन किया है क्योकि तत्त्वतः ओर प्रकारतः अन्य ब्रह्माण्ड और यहाँ की घटनाओं में कोई विभेद नहीं हे । विपश्चित्‌ लोग अनन्ताकाश में अपनी-अपनी वासना से कल्पित अन्यान्य संसारो में उसी तरह के शरीरो से पूर्वोक्त उन उन दिगन्तरो में घूमे, एक में ही नहीं । उनमें से पूर्व विपश्चित्‌, जिसकी मति संसारभ्रमण से तव तक खिन्न नहीं हुई थी, अनेकानेक जगद्भरान्ति का भ्रमण कर काकतालीयन्याय से इसी ब्रह्माण्ड में किसी एक पर्वतगुफा में मृग हो गया | वह जगतां मे भ्रमण करता हुआ जिस दूरवर्ती सृष्टि में विद्यमान है, वह यह सर्ग काकतालीयन्याय से ब्रह्माकाश में स्थित हे