Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verses 44–45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verses 44–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 44,45
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
वह किस प्रकार दूब चरता है ? बुढ़ापे के समान शिथिल ज्ञानवाला वह कब अपने पूर्व विपश्चित्-जन्म
का स्मरण करेगा ?