Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
दूरापसृतसभ्यं तज्ज्वालाजालं विलोकयन् ।
मृगः प्राग्भक्तिभावेन प्रोल्ललास विलोकितैः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
भ्रान्तिपूर्ण बुद्धिवाले उन तीन विपश्चितो को
आज भी अविद्या का अन्त प्राप्त नहीं हुआ । हजारों अज्ञानां से वृद्धि को प्राप्त हुई यह अविद्या निस्सीम
हे । इसका अन्त पा जाना कोई खिलवाड़ नहीं हे