Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verses 2–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 131, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
अस्मिन्नवसरे तत्र राज्ञः पार्श्वे व्यवस्थितः ।
प्रसङ्गपतितं वाक्यं विश्वामित्रोऽभ्युवाच ह ॥ २ ॥
भूमेरन्तावलोकार्थमद्याप्युद्वेगवर्जितम् ।
प्रवृत्ता न निवर्तन्ते वहनात्सरितो यथा ॥ ३ ॥
अद्य सप्तदशं वर्षलक्षमक्षीणनिश्चयाः ।
एवमेव भ्रमन्तोऽस्यां वटधाना भुवि स्थिताः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जिस पुरुष की
जिस चिरकाल उपासित देवता से बार-बार अभिलाषासिद्धि पहले कही गई है, उस पुरुष की उस
देवता के बिना अभिलाषा की सिद्धि नहीं होती | यदि घुणाक्षरन्याय से कदाचित् हो भी जाय तो वह
शोभा नहीं पाती, कदाचित् शोभा भी पा जाय पर सुखदायी नहीं होती, कदाचित् सुखदायी भी हो
जाय पर परलोक हितकारी सत्फलप्रद कदापि नहीं होती । इस विषय में भगवती श्रुति भी है - यः
स्वां देवतामतियजति प्रस्वायै देवतायै च्यवते न परां प्राप्नोति पापीयान् भवति” (जो अपने इष्टदेव
का अतिक्रमण करके यज्ञ करता है वह च्युत होता है, परम गति नहीं पाता, अत्यन्त पापिष्ठ होता
है ।) वृद्धो का भी कथन है - त्वामतियजेत भगवन्यः कुलदेव द्विजातिकुलजातः । उभयभ्रष्टो
नश्येदभ्युदयोपाशु-याजवत्स जड़: । अर्थात् भगवन्, द्विजातिकुल में उत्पन्न हुआ जो पुरूष कुल के
इष्टदेव आपका उल्लंघन कर यज्ञ करता है वह जड़ इस लोक और परलोक दोनो से भ्रष्ट होकर
नष्ट हो जाता है । अग्नि ही विपश्चित् की इष्टार्थ प्रदान द्वारा रक्षा करनेवाला है, उसमें प्रवेश करने
से यह मृग निर्मल सुवर्ण जैसे पूर्वं जन्म के विपश्चित् शरीर को प्राप्त होगा । यह सब मेँ अभी करता
हूँ। आप लोगों को तमाशा दिखलाता हू । यह मृग अभी-अभी आप लोगों के सामने अग्नि में प्रवेश
करता हे