Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verses 5–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 131, verses 5–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 5-10
संस्कृत श्लोक
अयं खलु महालोको वर्तुलो व्योम्नि संस्थितः ।
बालसंकल्पतरुवद्ब्राह्मसंकल्पनिश्चयः ॥ ६ ॥
कन्दुके व्योम्नि संरुद्धे दशदिक्कं पिपीलिकाः ।
इत्थं भ्रमन्ति भूतानि तदाधाराणि नित्यदा ॥ ७ ॥
भूगोलकाधोभागानि तदङ्गान्यूर्ध्ववन्ति च ।
तदा भूतानि तिष्ठन्ति तान्याविश्य भ्रमन्ति च ॥ ८ ॥
तमेवाविश्य दूरेण सरितश्चर्क्षमण्डलम् ।
असंस्पर्शा भ्रमन्त्युऽच्चैः सचन्द्रार्कादि संततम् ॥ ९ ॥
इहैव सर्वदिक्कं द्योस्तामावेष्ट्य व्यवस्थिता ।
सर्वदिक्कं खमत्यूर्ध्वं तस्याधस्तान्महीतलम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : पुण्यकर्मा मुनिवर श्रीवसिष्ठजी ने यह कहकर, वहाँपर अपने कमण्डल
के जल से विधिपूर्वक आचमन कर इन्धनहीन ज्वालापुंजस्वरूप अग्नि का ध्यान किया । श्रीवसिष्ठजी
के ध्यान करने से सभा के बीच से अग्नि की ज्वालाएँ धधक उटीं । उन ज्वालाओं में अंगारों का नाम
निशान न था, लकड़ियों का उनसे कोई सम्पर्क न था, न धुआँ था ओर न कालिख ही थी । वे सोने सी
स्वच्छ ज्वाला धप-धप दहक रही थीं । उनकी अति सुन्दर कान्ति निखर रही थी, उनका पुंज सोने के
मन्दिर के सदश दर्शनीय था, फूले हुए पलाश की-सी आकृतिवाली ज्वालाराशि सन्ध्या समय के मेघ
के समान उदित हुई थी । सभासद ज्वालाराशि से दूर हट गये थे । उस ज्वालाराशि को पूर्वं जन्म के
भक्ति भाव से आदर सहित देख रहे मृग को उसके दर्शनों से बड़ी प्रसन्नता हुई । उस वहि को देख रहा
वह निष्पाप मृग प्रवेश करने की इच्छा से छलंगि भरता हुआ सिंह की नाई पीठे की ओर दूर तक
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