Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verses 21–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 131, verses 21–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 21-23
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रं यद्यदाभातं जलवाहविवर्तवत् ।
तत्तादृक्कथमन्याभमन्यस्यासंभवाद्भवेत् ॥ २१ ॥
अभावः खे च खमिदं सर्गादौ परमाम्बरम् ।
स्वयं जगदिवाभाति नान्यत्प्रलयसर्गकौ ॥ २२ ॥
यथा कषति चिद्रूपं तथैव रतिमेत्य तत् ।
दृष्टादृष्टैः स्वसंसारैश्चिरमास्ते यथा चिरम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तुल्य महाकान्ति वह भास नाम से प्रख्यात हुआ । मूर्तिमान् आभास-सा यह भास नाम से प्रसिद्ध होगा,
कतिपय सदस्यों ने ऐसा कहा, इस कारण वह भास कहलाता है