Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 131, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
विचित्रदेहैर्वरशापयोगाद्दृश्यान्यनन्तानि मया महात्मन् ।
जन्मान्तरावर्तविवर्तनानि दृढैकचित्तेन वरात्कृशानोः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीदशरथ ने कहा : खेद है, जैसे जंगली हाथी चिरकाल तक बाँधने के खूँटे से दुःख पाता है वैसे ही
विपश्चित् ने अविद्या से चिरकाल तक दुःख पाया है