Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भास उवाच ।
मन्दरे मृदुमन्दारमन्दिरे मन्दराभिधाम् ।
आलिंग्याऽप्सरसं सुप्तं सरित्तृणमिवानयत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
एक सौ तीसवाँ सर्गं समाप्त
एक सौ इकतीसवाँ सर्ग
वटधाना राजपुत्र की कथा सुनाकर श्रीविश्वामित्रजी द्वारा
प्रित विपश्चित् का अपनी भ्रान्ति का विस्तार से वर्णन ।
श्रीदशरथ ने कहा : इन विपश्चित् ने दिगन्त भ्रमणरूप अपुरुषार्थभूत अविद्या के उदेश्य से जो
अनेक कष्ट झेले, उस सबको मैं आत्मज्ञानविहीन इसकी भ्रान्तिरूप निरर्थक चेष्टा समझता हूँ,
क्योकि मिथ्यारूप दिगन्तदर्शन आदि कौतुक में “इसे मैं अवश्य करूँगा” इस प्रकार का दुराग्रह
क्लेशप्रद होता ही है