Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 2–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verses 2–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 2-5
संस्कृत श्लोक
मामथासौ मया पृष्टा समाश्वास्य जलाकुला ।
बाले किमिदमित्युक्तं तया चपलनेत्रया ॥ २ ॥
इह चन्द्रोदयेष्वेताश्चन्द्रकान्तकटप्रजाः ।
नद्यो माद्यन्ति वनिताः सेष्टा इव निशागमे ॥ ३ ॥
त्वत्संगमरसावेशवशात्तन्ननु विस्मृतम् ।
इत्युक्त्वा मामुपादाय सोड्डीना विहगीव खम् ॥ ४ ॥
भृङ्गं श्रृङ्गवतः श्रृङ्गे गङ्गाकनकपङ्कजे ।
अहमासं समाः सप्त तत्क्लिन्नोऽकर्दमाप्लुते ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज दशरथ के वचन सुनने से श्रीविश्वामित्रजी को वटधाना राजपुत्रो का वृत्तान्त संस्कार
उदृबुद्ध हो गया । प्रस्तुत विपश्चितृवृत्तान्तवर्णन प्रयोजन को दृढ़ करने में हेतु भूत होने से उक्त वृत्तान्त
को अनुपेक्षणीय समझकर वाल्मीकिजी कहते है।
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : उस अवसर में वहाँ राजा दशरथ के समीप बैठे हुए श्रीविश्वामित्रजी
ने प्रसंगप्राप्त वाक्य कहा : राजन्, आपने बहुत ठीक कहा, कारण कि जिन्हे तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं
हुआ ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनकी दृष्टि में इस प्रकार के विचित्र भ्रान्तिज्ञान से वेद्य वासनामय
अनन्त कोटि जगत्रूप बहुत से पदार्थ उत्पन्न होते ही रहते हैं आगे कही जानेवाली भूमि में
वटधाना नाम के राजकुमार विपश्चित् के समान ही आज तक लगातार सत्रह लाख वर्षं से घूम रहे
हैँ । आज भी वे भूमि का अन्त देखने के लिए किसी प्रकार के उद्वेग से रहित होकर प्रवृत्त हैं, वे वैसे
ही उससे निवृत्त नहीं होते, जैसे कि नदियाँ बहने से निवृत्त नहीं होतीं