Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
अन्यन्मया जगद्दृष्टमृक्षचक्रविवर्जितम् ।
गर्भगर्भस्थैकजातिस्वप्रकाशजनावृतम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह पाताल, भूमि
आदि चौदह लोकों से बना हुआ महान् लोक (भूवनों की समष्टि) भूलोक के समान ही गोल
अन्तरिक्ष लोकों से गोलाकार होकर भूमि के चारों ओर आकाश में स्थित है | यह हिरण्यगर्भ का
निश्चय संकल्प ही है, उससे अतिरिक्त नहीं है । यह ज्योतिषशास्त्र में प्रसिद्ध भूगोल, चोदह भुवन
के लोग जिसके आधारपर रहते हैं, बालक के संकल्प-वृक्ष के समान आकाश में निराधार स्थित हैं
कारण कि यह भी ब्रह्मा का संकल्प निश्चय ही हे