Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
दृश्याख्याया अविद्याया न त्वन्तं प्राप्तवानहम् ।
मिथ्यैव हृदि रूढायाः पिशाच्या इव बालकः ॥ १६ ॥
नेदं नेदं सदित्येव विचारानुभवे स्थितम् ।
तथापीदमिदं चेति दुर्दृष्टिर्न निवर्तते ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, आकाश में रुके हुए गेंद में घूम रही
चींटियों की नाई आज भी वे घूमने में व्याकुल हैँ ओर थकते भी नहीं हैं। इस भूगोल के नीच के ऊपर
अथवा अगल-बगल के जिस किसी प्रदेश में वे पहुँचते हैं वहाँ यहीं की तरह अच्छी तरह ऊपर, नीचे
और दिशाओं को देखते हैं