Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 20–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
यदेतदेकान्तविहारहारि स्वच्छन्दमेकामितमस्तशङ्कम् ।
क्वचिन्मया चारुजगत्सु दृष्टं तुल्या न तस्यामरराजलक्ष्मीः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्प-कल्यना का अधिष्ठान चित् ही है इसलिए केवल वित् ही तत्त्व है, यह दूसरे ढंग से दृढ़
करते हैं।
संकल्प-कल्पना परम ब्रह्म से अतिरिक्त नहीं हे । संकल्प-कल्पना ही परम ब्रह्म है। इन दोनों में
वैसे ही कोई अन्तर नहीं है जैसे कि शून्यत्व ओर आकाश में कोई भेद नहीं है । जैसे जल के प्रवाह में हुए
आवर्त, तरंग ओर बुद्बुद जल ही हैं वैसे ही यहाँ जो कुछ प्रतीत होता है वह सब चिन्मात्र ही हैं। अन्य
वस्तु का अत्यन्त असम्भव होने से असदृश वह अन्यसदृश कैसे होगा ? आवर्तं आदि में नाभिगर्त आदि
का सादृश्य होने से कदाचित् उसमें अन्य-तुल्यता हो सकती है, किन्तु इसमें तो सदृश ओर असदृश
अन्य वस्तु का अत्यन्त असम्भव होने से अन्यतुल्यता कैसे होगी, यह भाव हे