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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

तालीतमालबकुलातुलतुङ्गश्रृङ्गमुन्नादवातजवमेकमहं स्मरामि । सूर्यादिभिर्विरहितं प्रकटं स्वकान्त्या सस्थावराद्रितटजङ्गममेव विश्वम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

कथा का उपसंहार कर उसकी प्रकृत मे योजना करते है। यह ब्रह्मा का संकल्पआडम्बर वास्तव में कुछ भी नहीं हे । चित्संकल्प स्वप्न दृश्य के समान असीम ओर अज्ञान है