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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 26

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

किन्तु शुद्ध विदणु के मध्य मे जगत्‌ अनुभव नहीं है, ऐसा कहते है । आवृत आत्मस्वरूपभूत उक्त जगत्‌ अनुभव अव्याकृतात्मा में ही स्थित है, किन्तु अविद्याविहीन चैतन्य में तो वे रहते ही नहीं हैं, क्योकि उसमें व्यावर्त्य अन्यरूपा के प्रसिद्ध न होने से उक्त जगद्‌अनुभव अत्यन्त अभिन्न ही रहते हैं