Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 27
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हिन्दी अर्थ
हे सुनिपुण आशयवाले श्रोताओं, चूँकि परम पद में सकल जगत्
अनुभव व्यावर्त्य अन्यरूपा के अप्रसिद्ध होने के कारण-अत्यन्त अभिन्न हैं, इसलिए मेने पूर्वापर का
भली-भाँति विचारकर वही सर्वव्यापक ज्योति-स्वरूप ब्रह्म जगत् है, यह कहा