Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 28
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हिन्दी अर्थ
इस प्रकार शुद्ध
चित् के एक होनेपर अपने परमपद से च्युत हुए बिना भी यह जीव द्वैतबुद्धि से “मेँ जीव हूँ” यों भिन्न
होकर जो मलिन होता है, दुःखी होता है, यह बड़े आश्चर्य की बात है