Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 32–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verses 32–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 32-35
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हिन्दी अर्थ
हे महात्मन्, भगवान्
अग्निदेव के वर से दिगन्त देखने के लिए दृढनिश्चय होकर मैंने वर और शापवश प्राप्त हुए विचित्र
शरीरो से अनन्त दृश्य देखे । यद्यपि मैं प्रत्येक ब्रह्माण्ड में विभिन्न देह से घूमता था तथापि पूर्व जन्म के
दृढ़ निश्चय का स्मरण रहने के कारण दृश्यात्मक पृथिवी आदिरूप अविद्या का अन्त देखने के लिए मैं
सदा जोर-शोर से प्रयत्नशील रहा । तदनन्तर मुझे मृत्यु के समय चित्त के वृक्षदर्शन-जनित संस्कार के
वेग से देह धारण करने की अभिलाषा हुई, अतएव मैं एक हजार वर्ष तक वृक्ष बना रहा । वृक्षावस्था में
बाह्नप्रवृत्ति में निमित्तभूत प्राणचेष्टा न होने से मेरा चित्त भीतर ही रहता था बाहर नहीं जा सकता था,
वृक्षशरीराभिमानी मेरा जीव दुःख का भोग करता था ओर पूर्वापर विचार मेँ कारणभूत चित्तके बिना ही
मैं पुष्प, फल आदि को उत्पन्न करने में कन्द के समान भूमि के रस और वसन्त-ऋतु आदि काल के
अधीन रहा। सौ वर्ष तक मैं मेरुपर्वतपर मृग हुआ। मृगावस्था में मेरी दूब के तिनके चरने ओर गीत सुनने
में अत्यन्त आसक्ति रही सोने के समान मेरा रंग रहा ओर पेड़ के पत्ते के तुल्य कान रहे । वनवासी
सकल जीवों में मैं सबसे छोटा था, अतः किसी पर वार नहीं करता था