Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 40
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हिन्दी अर्थ
उसके बाद मैं कालंजर पर्वत पर फूले हुए कंजे और घुँघची
के वन में सियार की योनि को प्राप्त हुआ। वहाँपर किसी हाथी ने अपने पंजे से मुझे चूर-चूर कर दिया ।
उस अधमरी दशा में मैंने मुझे कुचलने वाले हाथी को सिंह के हाथ मरा देखा