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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 45–47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verses 45–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 45-47

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अपनी जन्मपरम्पराओं के वर्णन के बीच में उसे अकस्मात्‌ आश्वर्यमय कतिपय अन्य वृत्तो का स्मरण हो आया उन्हें वह बड़ी उत्सुकता से कहना आरंभ करता है । हे मुनिवर, दूसरी एक अत्यन्त आश्चर्यमय वस्तु हे, उसे सुनिये । वह अनन्त ब्रह्माण्डों से भरी है, उसके निखिल दिशाओं में रहनेवाले प्राणी जलचरो के तुल्य है, अतएव उसमें तेज, आकाश ओर वायु के अस्तित्व में सन्देह है। उसकी भूमि की आकृति जल में प्रतिबिम्बित भूतकी-सी है । उक्त आश्चर्यमय वस्तु थोड़ा-बहुत व्याकृत नामरूपवाला ब्रह्म ही हे । (वह आश्चर्य ओर चाँदी की शिला के अनुसार सत्री-शरीर आदि सकल पदार्थों में भी सकल जगत्‌ रूप गर्भ प्रत्येक में है ऐसा एक दूसरा आश्चर्य मेने वहाँ देखा यह कहने के लिए किसी स्त्री का उदाहरण देता है ।) एक जगह मैंने एक स्त्री देखी । उसके शरीर में सुन्दर शीशे के अन्दर प्रतिबिम्बित हुए जैसे आकाश, पर्वत आदि सहित दिशा, काल, प्राणी आदि से पूर्ण तीनों जगत्‌ शोभित होते हैं, यह अत्यन्त आश्चर्य है । तदुपरान्त मैंने उससे पूछा : हे सुन्दरी, तुम कौन हो, तुम्हारा यह शरीर त्रिजगत्घटित कैसे है तब उसने मुझसे कहा, हे जीव, इस वस्तुसमूह में जो शुद्ध सर्वावभासिका चित्‌ है, वह मैं ही हूँ । ये महाजगत्‌ मेरे अंग हैं, मूर्त-अमूर्त शरीर हैं, क्योकि द्वि वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्त चैवामूर्त व ^ (ब्रह्म के दो रूप हैं मूर्त ओर अमूर्त) "यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरम्‌” जिसके सव भूत शरीर हैं) इत्यादि श्रुतियाँ हैं