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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 48–49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verses 48–49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 48

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हे जीव, जैसे मैं जगत्‌ घटित होने के कारण तुम्हारे लिए विस्मयावह हूँ वैसे यह सब स्तम्भ, घट आदि वस्तुएँ भी सर्वजगत्‌ घटित होने से अति आश्चर्यमय ही हैँ । शंका - यदि सभी वस्तुएँ जगत्‌ घटित हैं यानि प्रत्येक वस्तु के अन्दर सकल जगत्‌ विद्यमान हैं तो अन्य लोगों को भी ऐसा क्‍यों नहीं दिखाई देता 2 समाधान - जब तक प्रत्येक वस्तु का ऐसा स्वभाव ज्ञात नहीं होता, तब तक वे नहीं देखते जब एकमात्र आतिवाहिकभाव के बद्धमूल (दृढ़) हो जानेपर प्रत्येक वस्तु का ऐसा स्वभाव ज्ञात हो जायेगा तब वे भी अवश्य ही जानेंगे, इसमें संशय नहीं है