Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 51
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हिन्दी अर्थ
रत्रीसंवादरूप आश्चर्य का आँखों देखा वर्णन कर भास वैसा ही दूसरा आश्चर्य कहता है ।
एक समय में ऐसे लोक में जा पहुँचा जहाँ स्त्रियो का नामनिशान भी न था। मैंने वहाँ के सब प्राणियों
को स्त्रीसम्बन्ध की अभिलाषा से रहित देखा ।
शंका : तव वहाँ पुत्र-पौत्र आदि सन्तति विस्तार और पूर्वजो का मरण कैसे होता है ?
समाधान : वहाँपर बहुत से प्राणी एक भूत से निकलते है, प्रकट होते हैं और बहुत से प्राणी एक भूत
में प्रविष्ट होते है, विलीन होते हैं, इस प्रकार वहाँ नवीन सृष्टिका आविर्भाव और प्राचीन सृष्टि का
तिरोभाव होता है, यह तात्पर्य है