Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 57–58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 132, verses 57–58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 57,58
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हिन्दी अर्थ
जिसमें मेने विहार
नहीं किया वह दिशा नहीं है, जो देश मैंने नहीं देखा वह देश नहीं है, जिस कोतुक का मैंने अनुभव नहीं
किया वह कोतुक नहीं है ओर मेरे विमर्श से (अनुभवरूप सर्वसाक्षी से) अतिरिक्त अन्य में रहनेवाला
कोई विमर्श भी नहीं हे । अमृतमंथन के लिए क्षीर सागर में घुमाये गये मन्दराचल के रत्नमय शिखरो की
तीखी धारों के अग्रभागो से छिलने पर झनझन शब्दवाले भगवान् श्री हरि के बाजूबंदों की ध्वनि का मुझे
स्मरण हो रहा है, जिसे सुनकर लोगों को मेघ की गर्जना की आशंका हुई थी