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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 133, Verses 1–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 133, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 133 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

विपश्चिदुवाच । कस्मिंश्चिदन्यत्र जगत्यपूर्वे दृष्टं मयेदं श्रृणु किं विचित्रम् । महाघवृत्तान्तदशासमानमविद्ययान्धेन बलात्कृतं यत् ॥ १ ॥ अस्ति क्वचित्खे भवतामगम्ये जगज्ज्वलद्दीप्तिविचित्रसर्गः । एतादृगप्यम्बरतस्तदन्यत् स्वाप्नं पुरं जाग्रति चेतसीव ॥ २ ॥ तस्मिन्मया विहरता हृदयस्थमर्थमन्वेष्टुमक्षि निहितं ककुभां मुखेषु । पश्यामि यावदचलप्रतिमा धरायां छायालिजालमलिना परिबंभ्रमीति ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ इकतीसर्वो सर्गं समाप्त एक सौ बत्तीसवाँ सर्ग भास द्वारा पुनः अपनी विविध जन्मभ्रान्तियों का, महान्‌ आश्चर्यो का तथा संसार की असारता का वर्णन । भास आश्चर्यमय घटनाओं से व्यवहित अपने जन्मो की परम्पराओं के वर्णन की कथा का पुनः अनुसन्धान करता है। पर्वत के मध्यभाग के कदम्बो के झुरमुट में तपस्विता के अनुभव से बहुत दिन बिताने के कारण मुझे सिद्धि प्राप्त हो गई, अतएव मन्दराचल में मनोहर मन्दार के निकुंजरूपी मन्दिर के अन्दर मन्दरा नाम की अप्सरा का आलिंगन कर मैं सोया था । मुझे अपने वेग में गिरे हुए तिनके के समान आगे कही जानेवाली नदी बहा ले गई इसके उपरान्त जल में घबड़ाई हुई मन्दरा को आश्वासन देकर मैने उससे पूछा : “प्रिये यह क्यों हुआ ?” यानी हम दोनों अकस्मात्‌ नदी में क्यों बह गये ?' उस चंचलनयना ने मुझसे कहा : प्रियवर, इस प्रदेश में चन्द्रोदय होनेपर चन्द्रकान्तमणिमय पर्वत के मध्यभागो से निकली हुई ये नदियाँ चन्द्रकान्त मणियों से निकले हुए जलस्रोतों से वैसे ही मतवाली हो जाती हैं जैसे कि रात्रि के समय अपने प्रियतम के साथ स्तर्यो कामवासना से मतवाली हो जाती हैं