Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 134, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 134, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 134 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
विपश्चिदुवाच ।
एतस्मिन्नन्तरे व्योम्नः स पतन्पुरुषो मया ।
स्थमिताखिलभूपीठः शवरूपो विलोकितः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
इस अविद्याउपाख्यान में अत्यन्त अचम्भों के वर्णन के सिलसिले में शवोपाख्यान का भास के मुख
से वर्णन कराने के लिये भूमिका बाँधते हैं।
विपश्चित् ने कहा : हे मुनिवर, इस जगत् से भिन्न किसी दूसरे अपूर्व जगत् में मैंने आगे कहा
जानेवाला क्या अचम्भा देखा, उसे आप सुनने की कृपा कीजिये । वह ब्रह्महत्या आदि महापातकं
के कारण प्राप्त होनेवाले रोरव आदि नरकों के वृत्तान्त वर्णन के समान अत्यन्त ही बीभत्स था फिर
भी अविद्या से अन्धे बने हुए मुझे वहिदेव की वरप्राप्तिवश उसका अनुभव करना पड़ा
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ बत्तीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तैंतीसवाँ सर्म कहींपर भास ने जो अत्यन्त अचम्भा आकाश से सातद्दीपों के बराबर शवका गिरना देखा, उसका वर्णन ।