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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 134, Verses 2–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 134, verses 2–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 134 · श्लोक 2-10

संस्कृत श्लोक

स यावदुदराभिख्यो देहभागोऽस्य येन भूः । सप्तद्वीपापि पिहिताऽमातुः शैलोपमो महान् ॥ २ ॥ वह्निनोक्तमनन्तं तत्तद्भुजोरुशिरश्च मे । लोकालोकात्परं पारं प्राप्तं ह्यविषये नृणाम् ॥ ३ ॥ व्योमवासिचये देवीमथ स्तुवति सादरम् । व्योम्नः प्रकटतामागाच्छुष्का नु भवति स्वयम् ॥ ४ ॥ प्रेतवृन्दैरनुगता मातृमण्डललालिता । कुम्भाण्डयक्षवेतालजालतारकिताम्बरा ॥ ५ ॥ शिरालदीर्घदोर्दण्डवनीकृतनभस्तला । किरन्ती कीर्णदिग्दाहैर्दृष्टिपातैर्दिवाकरान् ॥ ६ ॥ स्फुरन्नानायुधाकारकचज्झणझणध्वनि । शतखण्डं खगानीकं कुर्वाणा व्योमकोटरे ॥ ७ ॥ देहज्वालेक्षणोष्माढ्यैः शरीरावयवैस्त्विषः । दीर्घवेणुवनाकाराः किरन्ती कोटियोजनाः ॥ ८ ॥ दन्तकान्तीन्दुविद्योतदुग्धस्नपितदिङ्मुखा । कृशातिदीर्घविस्तीर्णशरीरापूरिताम्बरा ॥ ९ ॥ निरालम्बास्पदा सांध्या विततेवाभ्रमालिका । प्रेतासनसमारूढा सुरूढा परमे पदे ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं आकाश में, जहाँ आप लोगों की पहुँच नहीं है, एक जगत्‌ है | वहाँ जगमगा रही सूर्य ओर चन्द्र की कान्ति से विचित्र सृष्टि हे । यद्यपि वह जगत्‌ रूप-रेखा से इस ब्रह्माण्ड के सदृश ही है तथापि इस ब्रह्माण्ड की दृष्टि से शून्य होने के कारण इससे भिन्न ही हे । जैसे कि स्वप्न में दृष्टिगोचर हुआ नगर यद्यपि रूपरेखा से जाग्रत अवस्था में दृष्ट नगर के समान ही रहता है तथापि जाग्रत की दृष्टि से शून्य होने के कारण चित्त में जाग्रतदृष्ट नगर से भिन्न ही प्रतीत होता है । उस जगत्‌ में निवास कर रहे मेने अपनी वांछित वस्तु (अविद्या का अन्त) दिगन्ता मे खोजने के लिए दिशाओं की ओर आँखें फेरी । दिशाओं में कौतुक देखने के लिए ज्योंही मैं प्रवृत्त हुआ त्योंही मैंने पृथ्वीपर भँवरों के झुण्ड की नाई काली-काली पहाड़-सी बड़ी छाया घूमती देखी । उसके बाद अति विशाल होने के कारण अति आश्चर्यरूप यह छाया करनेवाला क्या हो सकता है यों विचार करते हुए मैंने ज्योंही ऊपर की ओर दृष्टि डाली त्योंही झटपट आकाश से चक्कर काटकर नीचे गिर रही पर्वत-सी पुरुषाकृति मुझे दिखाई दी । पर्वत के तुल्य महान्‌ यह पुरुष ब्रह्मा है अथवा ब्रह्माण्डशरीर विराट्‌ पुरुष है ऊपर से फेंके हुए पर्वत के समान इसका शरीर गिर रहा है । महान्‌ तो यह इतना है कि इसने अपने शरीर से तमाम आकाश को ढक दिया है। प्रसिद्ध भगवान्‌ सूर्य भी, इससे दिनशोभा के सर्वथा लुप्त होने के कारण, शोभा नहीं पा रहे हँ । मैं अपने मन में इस प्रकार विचार कर ही रहा था कि अकस्मात्‌ आकाश से भगवान्‌ सूर्य-प्रलय कालीन वायुओं से उखाड़े हुए ब्रह्माण्ड के ऊर्ध्व कपाल के गिरने में जैसा घनघोर शब्द हो वैसे घनघोर शब्दवाले वेग के साथ-पृथ्वी पर गिरे | भयानक स्वरूपवाली जिसकी देहका पारावार नहीं था ऐसी पुरुषाकार वस्तु के गिरने और सातद्वीपवाली पृथिवी को एक क्षण में ढक लेनेपर मुझे उसके दबाव से द्वीप और लोकों के साथ अपने शरीर के अवश्यम्भावी विनाश की आशंका हुई । तदनन्तर मैं पास में स्थित अग्नि में प्रविष्ट हो गया। सैकड़ों जन्म जन्मान्तरों में मैंने भगवान्‌ अग्नि की पूजा कर रक्खी थी, अतएव उन्होंने चन्द्रमा के समान शीतल शरीर बनकर मुझको ढ़ाढस दिया, मत डरो कहा । हे देव, आपका जय जयकार हो, आप हमारे प्रत्येक जन्म में परम आश्रय हैं । हे प्रभो, अनवसर में ही यह प्रलय प्राप्त है, अतः आप मेरी रक्षा कीजिये