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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 134, Verses 11–25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 134, verses 11–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 134 · श्लोक 11-25

संस्कृत श्लोक

स्फुरन्ती प्रज्वलद्रूपा संध्या जलधरारुणा । दधाना गगनाम्भोधौ वाडवज्वलनश्रियम् ॥ ११ ॥ शवैः शवाङ्गैर्मुसलैः प्रासतोमरमुद्गरैः । वृसिकोलूखलहलैः किरन्ती चञ्चला स्रजः ॥ १२ ॥ प्रजां कटकटाटोपैर्वहन्ती गगनाङ्गणे । दृषदां घर्घरारावैः प्रावृङ्गिरिरिवाचले ॥ १३ ॥ देवा ऊचुरयं देवि उपहारीकृतोऽम्बिके । सार्धं स्वपरिवारेण शीघ्रमाह्रियतामिति ॥ १४ ॥ वदत्येवं सुरानीके तं शवं प्राणवायुना । देवी प्रववृते रक्तसारमाक्रष्टुमञ्जसा ॥ १५ ॥ प्राणेनाकृष्यमाणं तद्रक्तं भगवतीमुखे । अविशत्सांध्यमेघौघ इव मेरोर्गुहान्तरम् ॥ १६ ॥ तावद्रक्तं तया पीतं प्राणाकृष्टं नभःस्थया । यावच्छुष्का सती तृप्ता पीना सा चंडिका स्थिता ॥ १७ ॥ ततो बभूव सा रक्तपरिपीनशरीरिणी । रक्ता वर्षाभ्रमालेव तडित्तरललोचना ॥ १८ ॥ लम्बोदरा भगवती विषमाहिविभूषणा । रक्तासवमदक्षीबा समस्तायुधधारिणी ॥ १९ ॥ व्योम्नि नर्तनमारेभे स्वशरीरार्धपूरिते । पर्यन्तगिरिमालाग्रस्थितामरनिरीक्षिता ॥ २० ॥ ततः पिशाचकुम्भाण्डरूपिकादिमहागणाः । शवमावारयांचक्रुर्महाचलमिवाऽम्बुदाः ॥ २१ ॥ शवशैलो गृहीतोऽसौ कुम्भाण्डैः कटिभागतः । उदराद्रूपिकावृन्दैर्यक्षैः कुञ्जरविक्षतैः ॥ २२ ॥ भुजोरुकन्धराद्यास्ते तस्यान्येऽवयवा यतः । ब्रह्माण्डस्य परं पारं प्राप्ताः परमविस्तृताः ॥ २३ ॥ ततस्तैर्भूतसंघातैः स्थिता दूरे दिगन्तरे । न प्राप्ता वै हि तत्रैव कालेन कलिताः स्वयम् ॥ २४ ॥ नृत्यन्त्यां चण्डिकायां खे भूतवृन्दे शवाकुले । देवेष्वद्रिषु तिष्ठत्सु बभूव भुवनं तदा ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अग्नि की प्रार्थना करने पर अग्नि ने पुनः मुझे ढाढस देते हुए मत डरो कहा ओर यह भी कहा हे अनघ ! उठो हम दोनों अपने अग्निलोक को जाते हैं, तुम आओ किसी प्रकार का सोच मत करो | यह कहकर तदनन्तर भगवान्‌ अग्नि अपने वाहन तोते की पीठपर मुझे बैठा कर पूर्वोक्त गिरे हुए शव के शरीर का एक हिस्सा जलाकर उसमें से निकलने के लिए एक छिद्र बनाकर आकाश में उड़ गये । तदुपरान्त आकाश में पहुँचकर मैंने वह पूर्वोक्त शवपतनरूपी महोत्पात देखा, जो अतिभयानक कष्टग्रद आकृतिवाला था | उक्त महाशव जब पृथिवीपर गिरा तब सारी पृथिवी सागर, पर्वत, वन, नगर ओर जंगलों के साथ काँप उठी, उससे बह रही नदियों का प्रवाह रुक गया, अतएव उसने गिरिनदियों के दोनों तटोंपर मार्गान्तर मेँ जल बहने के कारण दो जलप्रपात बना डाले । वेग से गिर रही जलराशि ने भीषण गर्तं बना डाले, जो मनुष्य विरचित बावडी, कुएँ ओर तालाबों से विलक्षण थे। उसके गिरनेपर भूमि में चीत्कार हुआ, उत्तर दिशा, पूर्व दिशा, दक्षिण दिशा ओर पश्चिम दिशाओं में हाहाकार मचा, आकाश में तुमुल ध्वनि हुई । पर्वत और प्राणियों के साथ सारे जगत्‌ ने प्रलय की भ्रान्ति से भयभीत होकर विविध प्रकार के चीत्कार रोदन, हाहाकार आदि किये । गिरे हुए शव के धारण करने में पृथिवी से कोलाहलपूर्णं ध्वनि निकली । उसके कोलाहलपूर्णं वेग के आटोप से समस्त दिगन्तो का कोलाहल दब गया । आकाश से भी अत्यन्त तेज होने के कारण अन्य ध्वनियों से न दब सकनेवाली घुंघुम ध्वनि निकली । यदि अनेक गरुड़ भय से भागे तो उनके भयपूर्वक तेजी से भागने में जैसी प्रचण्ड ध्वनि होती है ठीक वैसी ही वह ध्वनि थी | पर्वतो की गुफाओं को खूब तोडने फोड़ने से पैदा हुआ घनघोर शब्द, भीषण भय के लिए तथा कान, हृदय आदि का भेदन करने के लिए चारों ओर से पैदा हुआ । उक्त शब्द उत्पातो के कारण भयंकर वेगवाले अतएव जालो की नाई अपनी ओर खींचने वाले प्रलय-वायुओं से कुपित हुए प्रलयकालीन मेघो के निर्धोष को अपनी तीक्ष्णता के सामने मात करता था। उस शव के वेग से गिरने पर पृथ्वी कोलाहलपूर्णं हुई । दिशाओं के मारे कोलाहल के गूँज उठने से पृथिवी में सौगुना अभिघात हुआ । पृथिवी पर अभिघात होनेपर कुल पर्वतो के महातट मटियामेट हो गये ओर हिमालय के शिखर पाताल को चले गये । मेरुपर्वत की शिला के समान रूपरेखावाले शव के गिरने से पर्वतों के शिखर तहस-नहस हो गये, पृथिवी के टुकड़े-टुकड़े हो गये, समुद्रो में ज्वारभाटा आ गया, पहाड रसातल चले गये, सकल प्राणियों को क्लेश हुआ, प्रलय चाहनेवाले रुद्र आदि गणो का खिलवाड़ हुआ, सूर्य पृथिवीपर गिर पड़ा, द्वीपसमूह आच्छन्न हो गये, पहाड़ों का चूरा चूरा हो गया ओर पृथ्वीमण्डल छिन्न-भिन्न हो गया । उस शव को आकाशचारी देव, गंधर्व आदि ने महान्‌ आकार से दूसरा भूतल-सा, ब्रह्माण्ड का दूसरा अर्धं भाग-सा, गिरा हुआ आकाश-सा देखा | इसके पश्चात्‌ जब मैंने गौर से उसे देखा, तो वह मांसमय पर्वत निकला । उसका एक अंग भी सप्तद्वीपा पृथिवीपर नहीं समा सकता था । उसे देखकर मैंने अपने ऊपर सदा अनुग्रह करनेवाले भगवान्‌ अग्निदेव से पूछा : भगवन्‌, यह क्या है ? वह मांसमय शरीर कैसे गिरा, उसके साथ आकाश से सूर्य कैसे गिरा ओर पर्वत, वन ओर जलधिसहित भूमितल में यह क्यों नहीं समाता है २