Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 135, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 135 · श्लोक 44
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हिन्दी अर्थ
हा खेद है, पृथिवी कहाँ चली गई, सागर कहाँ चले गये, जनता कहाँ चली
गई और पर्वतराशि कहाँ चली गई ?