Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verses 18–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 137, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
उदयावयवाश्लेषस्पष्टास्पष्टमरुद्रतैः ।
स्थित्यन्तानां तु वैषम्यादागामिगदसूचकम् ॥ १८ ॥
दरत्सरभसच्छिद्रावातवातेन शब्दितम् ।
पद्मनालप्रणालान्तर्ज्वलदर्णववाडवम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त जैसे वर्षा ऋतु, पूर्वी वायु, वर्षा आदि का जल - इन सबसे अंकुर पैदा करने में सक्षम
भूमि में बोया हुआ बीज फूलकर जाग्रत होता है वैसे ही उसका वायु के अन्दर स्थित वह चेतन उद्बुद्ध
हुआ । महामुनि के शाप को जाननेवाली, मच्छर की योनि को प्राप्त होनेवाली उक्त अन्तःकरण में
स्थित असुर की चिति उक्त संस्कारों से विद्ध होकर मच्छर के पंख, पैर आदि अंगों को जानकर स्वयं
मच्छर हो गई